भूमिका

1.  आज भारत की परिस्थिति

भारत के आज के नागरिकों पर बहुत बढ़ी जिम्मेदारी आ गई है। नागरिक होने के नाते हम इसकी संपदा और संस्कृति के संरक्षक भी हैं, और भारत में जीवन सौभाग्य मिलने के कारण यह हमारा सर्वोच्च ऋण भी है।

पीछे समय और कारणों में जाने का कोई औचित्य नहीं है। लम्बे इतिहास में आयी कुरितियां, इतने शोषण, गुलामी व अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्रों के बावजूद, हमने बहुत ठीक भी किया है और संभाला भी है।

हमने भौतिक सुविधाओं पर बहुत कार्य किया है । लेकिन इस प्रक्रिया में हमारी संस्कृति के ज्ञान, शक्तियों व संसाधनों का लगातार शोषण हुआ, जिससे आज की स्थिति आ गई।

आज भारत की तस्वीर बनायें तो कहां खड़े हैं-

• व्यवस्था की जटिलता और व्याप्त भ्रष्टाचार
• भारतीयता पर शोषण प्रवृत्ति का हावी होते जाना

 इससे जन्मीं अनेक परिस्थिति जो आम जनमानस को झकझोर रही हैं

  • पैसे का अभाव या तनाव और असमानता
  • व्याप्त बेरोजगारी
  • भविष्य की अनिश्चिंतता
  • परिवार का बिखराव, पलायन
  • प्रकृति का विनाश (और उससे उपजे तनाव)
  • अस्वस्थ परिवार
  • सामाजिक सुरक्षा व न्याय का पतन

समाज या राष्ट्र के स्तर पर –

• हमारी हर संपदा जैसे संस्कृति का प्रतीक बड़ी नदियां तक खात्मे की ओर हैं, उन पर रेत से लेकर पानी तक दूरस्थ व्यवसायिक कब्जा हो रहा है।
• हर तरफ कब्जा है - शहरों में खेल मैदान से लेकर , रेत और खदान से लेकर, शिक्षा और स्वास्थ्य तक, न्याय और सरकारी प्रक्रियांओं तक
• हमारी हरेक ज्ञान व सांस्कृतिक व्यवस्था जैसे वैद्य व्यवस्था , पंचायती राज, उद्यमिता, घरेलू व्यवसाय को कमजोर किया , फिर पराधीन कर दिया।
• एक तरफ , पिछले 10 साल में 100 लाख करोढ़ से ज्यादा का कर्ज चढ़ा। दूसरी तरफ ग्रामीण भारत , प्राकृतिक संसाधन की लूट अलग हुई।
• गाय , गंगा, ग्राम, जिनमें भारत की ऊर्जा, संपदा, स्वाध्याय की शक्ति थी, वह बहुत कमजोर स्थिति में हैं।
• आज अमेरिका हमें दिशा निर्देश देता है , या फिर चीन परोक्ष रूप से अपना युद्ध लढ़ता है।

आज का युवा , शांत है क्योंकि मां बाप ने सब शिक्षा पर खर्च कर दिया है। लेकिन बिना हुनर की शिक्षा और बिना नौकरी की परीक्षा, इनके बीच चुपचाप एक एकाकी भविष्य को ग्लानीपूर्वक सर झुकाकर स्वीकार कर रहा है। जबकि उसकी कोई गलती नहीं।

सरकारी नौकरी की कतारें युवाओं की परिस्थिति की गवाह हैं।

बच्चों से खेल मैदान , और बुजुर्गों से उनकी पुरानी स्कूटर कार तक छिन रहे हैं।

जो कार्य सीधे महिलाओं के ज्ञान , हुनर व उत्पादन से जुढ़े थे, जैसे शिक्षा , स्वास्थ्य, उत्पादन, वह दूरस्थ करके उसके एवज में चंद पैसे से बहलाया जा रहा है।

इस परिस्थिति को जढ़ से बदलने की जरूरत है।

 

भारत, विश्व में अब एक ही संस्कृति बची है। हम विज्ञान , प्रकृति और चेतना , सभी को समाहित कर प्रगति का रास्ता जानते हैं। इसलिये अब भारतीय जनमानस को फिर जागना होगा। सिर्फ अपने या परिवार के लिये नहीं, भारत को जरूरत है और विश्व को भारतीय समझ की जरूरत है।

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2. परिस्थिति के पीछे के कारक

 

नव भारत की कल्पना से पहले मायाजाल भी समझना होगा। भारतीय मानस ने हमेशा निस्वार्थ तप और त्याग को ही सर्वोच्च माना है , इसलिये माया से ही छल हो सकता है।

विगत दशकों से भारत को खत्म कर , एक पाश्चात्य दिमाग, पाश्चात्य संसाधन पर पलने वाला वर्ग तैयार हुआ। इसके लिये , इसके अनूरूप – विकास के माॅडल बने, वित्तीय नीतियां बनी , जिससे शेयर तो खूब चढ़े, लोन खूब बंटे, लेकिन भारत लुटता गया।

पूरे भारतीय दिमाग व शैली वालों को रोजगार, शिक्षा , स्वास्थ्य की लाईन में लगाया गया। उनके हुनर खत्म किये गये।

यह जो पाश्चात्य दिमाग, पाश्चात्य संसाधन, वाला वर्ग बना, यह पूर्णतः पराश्रित बना। इसको न भारत के शिक्षण संस्थान में विश्वास है, न किसी सभ्यतागत ताकत की समझ। यही हर तंत्र में निर्णय लेने लगे, और अपने हित अनुसार भारत की व्यवस्था बनाने लगे जिसमें लगातार नये वादों का मायाजाल बनता है।

साधारण विचार से ही यह ध्वस्त हो जाता है-

• ये बताते हैं कि हम 3 या 5 या 7 ट्रिलियन डाॅलर की अर्थ व्यवस्था बना लें फिर समाधान होगा। 1 से 3 ट्रिलियन डाॅलर की अर्थ व्यवस्था बनाने में तो सारी संपदा और बेरोजगारी का यह हाल हो गया , अब इसी दिशा को आगे और बढ़ाने पर कैसे बदलेंगे?

• भारत में जो हर वर्ष नयी संपदा आती है, उसका मोल यदि लगाएं तो कितना होगा? जैसे जितना शुद्ध पानी मानसून में आता है, उतना मशीनों और पैसे से संभव है क्या? और उससे उत्पन्न औषधियां, मिट्टी, हुनर से जो सभ्यता बनती है उसका मोल है क्या? दरअसल इनको लूटकर ही भारत की लूट के लिये तंत्र बना है। जितनी विकेंद्रित उर्जा भारत को ईश्वर ने दी है, उसका लेश मात्र भी उपयोग नहीं होता, अन्यथा गायों की यह स्थिति नहीं होती। हमारी हजारों ट्रिलियन की संपदा को नजरअंदाज करने का षड़यंत्र भारत के साथ हो रहा है।

• कांक्रीट और कृत्रिम पूंजी से हम कितना ही भौतिक सांस्कृतिक पुनःनिर्माण कर लें, पीपल, बरगद, गंगा, नर्मदा , गाय, मानव , आदि अपने सभी शक्तिओं पर हो रही नृशंस क्रूरता से पूरी सभ्यता और भारत का अर्थ खत्म हो रहा है।

• रोजगार, छोटे उद्यम नैसर्गिक संपदा के बिना , सामाजिक न्याय के वायदे भी निभाए नहीं जा सकते।

सभी मायाजाल को हमारे भीतर बसे आराध्य ही ध्वस्त कर देंगे।
आज यदि सीता राम , भारत को देखें तो हमें पता है, राम किस तरफ ध्यान देते। हमें भी वही करना है।

चमक, शोर और आडंबर से भटकना नहीं है।

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3. भारत को भारत की शक्ति के अनुसार बनाने के सूत्र

 

भारत यानि संपदा, संस्कृति , सभ्यता के एकात्म का अद्भुत स्वरूप,
जिसको देखने की दृष्टि चेतनागत है।

यदि हमें नव भारत को यथार्थ में बदलना है तो सभी रुकावटों को हटाना है और सभी शक्तिओं को जगाना है।

पहली समस्या है भ्रष्टाचार:-

  •   जिसके दो पक्ष होते हैं -
    
    • एक पक्ष शोषण है । आज की तकनीक , बड़ी आसानी से पारदर्शिता और स्थानीय निकायों की स्वायत्तता और उनकी जवाबदारी तय कर सकती है। इससे जो शक्ति व जिम्मेदारी आमजन से छीनकर, केंद्रीयकरण हो गया है, वह आसानी से हल होगा।
    
    • दूसरा पक्ष उसका उपभोग है। यहां सबसे पहली जिम्मेदारी सत्ता की होती है। भ्रष्टाचार के जनक तो राजनैतिक संगठन हैं, जिनको संपत्ति बनाने और संस्थाओं की स्वायत्तता मिटाने के लिये इसकी जरूरत पड़ती है। जिनको लगातार जन शक्ति से चलना चाहिए, वह पैसे से चलने लगते हैं। इसका समाधान तो स्पष्ट नैतिक नियम वाले संगठन ही है। और ऐसे संगठन , सिर्फ तप और त्याग से ही चल सकते हैं। यही रामराज्य की भी पहली कसौटी है।

दूसरा आज के समय, व्यवस्था के मुख्य अस्त्र – कृत्रिम मुद्रा, नियम कानून, और तकनीक हैं। इनको भारत के अनुसार ढ़ालना जरूरी है।

• यह जरूरी है कि मुद्रा का ढांचा , भारत के अनूरूप हो। अभी छपी हुई मुद्रा पहले वित्तीय संस्थाओं और बड़े व्यावसायिओं के पास जाती है। फिर उनके अनुसार व्यवस्था में नीचे आती है। यह शोषण का बड़ा कारण है। भारत के अनुरूप मुद्रा पहले वहां जाये जहां भारत बन और बच रहा है। स्वतः ही सही माॅडल चलने लगेगे।• नियम और कानून में भारतीय संपदाओं पर पाश्चात्य सोच हावी है। उदाहरण के तौर पर गंगा नदी का दायरा 100 मीटर तय है , उसपर भी तटों पर कांक्रीट को अनुमति है। यह हाल सर्वत्र है। एक इनको बदलना होगा। दूसरे त्वरित न्याय के लिये पंचायत या निकाय स्तर पर न्याय देना होगा। आज तकनीक बहुत आसानी से यह प्रबंधन कर सकती है।

• आधुनिकम तकनीक से बड़े उद्योग भी बनते हैं और अति छोटे उत्पादन यूनिट भी। ड्रोन से लेकर ऊर्जा तकनीक अब इस स्तर पर आ गयी है कि सूर्य और गाय जैसी संपदा से हम अपनी ऊर्जा पूर्णता तक जा सकते हैं। निकाय स्तर उत्पादन पर उसके बाजार को प्रथमिकता भी तकनीक से आसानी से संभव है। इसलिए आने वाला समय, भारत के लिये बहुत उज्जवल संभावना का है।

• तीसरा, महान संस्कृति और सभ्यता के लिये बहुत जरूरी है कि संस्थागत ढांचे में सभी संरक्षक संस्थान को ऊचित जगह मिले। यही हमारे स्वर्णिम काल का कारण था। भारत में आध्यात्म, विज्ञान, आदि के अनेकों प्रमुख संस्थान हैं। यह भारत के स्थायी संरक्षक हैं। इनका सत्ता या पैसे के सामने झुकना हमारी हार है। आज तकनीक बड़ी आसानी से जनमानस के माध्यम से इनको भी अपर संसद में जगह दे सकती है।

• चौथा , शिक्षा और स्वास्थ्य, मानवता के पहले सबूत हैं। इनमें भेदभाव और पराधीनता, और व्यवसाय, न सिर्फ समाज को असमान और डरा हुआ बना देता है , बल्कि इतने बुद्धिमान जनमानस की प्रचुर संभावनाए भी खत्म करता है। आज हमें न सिर्फ तकनीक का सहारा है, बल्कि समय है कि भारतीय स्वास्थ्य परंपरा और ज्ञान परंपरा से प्रेरणा लेकर पराधीनता को खत्म किया जाये।

• पांचवा, बेरोजगारी और उसकी चिंता, न सिर्फ युवा जीवन खराब करती है , बल्कि परिवार और समाज तक बिखरते हैं। यह अमानवीय और अप्राकृतिक है। उपरोक्त बिंदुओं से बहुत हद तक यह स्वतः खत्म होगी क्योंकि इसकी जढ़ में केंद्रीयकरण, असमानता और भ्रष्टाचार है। सत्ता और समाज को अपनी इस पीढ़ी दर पीढ़ी की जिम्मेदारी को करना होगा।

उपरोक्त सूत्रों पर विस्तार, सुधार और प्रसार के लिये जनमानस को जागृत करके जोड़कर चलना जरूरी है।

यदि हम इन सूत्रों पर व्यवस्था बदलें तो अपनी नैसर्गिक संपदा, ज्ञान का संरक्षण और संचालन स्वतः करने लग जायेंगे। तभी हम बिना कर्जे चलने वाली बहुत बड़ी और संपन्न व्यवस्था बन जायेंगे।

अन्यथा दूसरा रास्ता , परस्पर आपसी द्वंद, पराधीनता और सभ्यतागत नाश की ओर तेजी से जा रहा है।

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